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Atharvaveda / 4 / 39 / 8

दिशो॑ धे॒नव॒स्तासां॑ च॒न्द्रो व॒त्सः। ता मे॑ च॒न्द्रेण॑ व॒त्सेनेष॒मूर्जं॒ कामं॑ दुहा॒म्। आयुः॑ प्रथ॒मं प्र॒जां पोषं॑ र॒यिं स्वाहा॑ ॥ 8॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 4 | Sukta : 39 | Paryay : | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : अङ्गिराः | देवता : चन्द्रमाः | छन्द : संस्तारपङ्क्तिः | स्वर :

विषय : परमेश्वर के गुणों का उपदेश।

पदपाठ : दिश॑: । धे॒नव॑: । तासा॑म् । च॒न्द्र: । व॒त्स: । ता: । मे॒ । च॒न्द्रेण॑ । व॒त्सेन॑ । इष॑म् । ऊर्ज॑म् । काम॑म् । दु॒हा॒म् । आयु॑: । प्र॒थ॒मम् । प्र॒ऽजाम् । पोष॑म् । र॒यिम् । स्वाहा॑ ॥३९.८॥

पदार्थ : (दिशः) सब दिशाएँ (धेनवः) दुधैल गौओं के समान हैं। (तासाम्) उन [गौ रूपों] का (वत्सः) बच्चा रूप (चन्द्रः) चन्द्रमा है। (ताः) वे [गौ रूप] (मे) मुझे (वत्सेन) बच्चा रूप (चन्द्रेण) चन्द्रमा के साथ (इषम्) अन्न, (ऊर्जम्) पराक्रम, (कामम्) उत्तम मनोरथ (प्रथमम् आयुः) प्रधान जीवन, (प्रजाम्) प्रजा, (पोषम्) पोषण और (रयिम्) धन (दुहाम्=दुहताम्) परिपूर्ण करें। (स्वाहा) यह आशीर्वाद हो ॥८॥"

भावार्थ : मनुष्य चन्द्रमा के गुणों का पृथिवी के साथ सम्बन्ध जानकर अन्न आदि पदार्थों को पुष्ट करके आनन्द भोगें ॥८॥

टिप्पणी :८−(दुहाम्) दुहताम् प्रपूरयन्तु। अन्यत् पूर्ववत्। म– २, ७ ॥