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Atharvaveda / 5 / 31 / 7

यां ते॑ च॒क्रुः सेना॑यां॒ यां च॒क्रुरि॑ष्वायु॒धे। दु॑न्दु॒भौ कृ॒त्यां यां च॒क्रुः पुनः॒ प्रति॑ हरामि॒ ताम् ॥ 7॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 5 | Sukta : 31 | Paryay : | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : शुक्रः | देवता : कृत्याप्रतिहरणम् | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : राजा के धर्म का उपदेश।

पदपाठ : याम् । ते॒ । च॒क्रु: । सेना॑याम् । याम् । च॒क्रु॒: । इ॒षु॒आ॒यु॒धे । दु॒न्दु॒भौ । कृ॒त्याम् । याम् । च॒क्रु: । पुन॑: । प्रति॑ । ह॒रा॒मि॒ । ताम् ॥३१.७॥

पदार्थ : (याम्) जिस [हिंसा] को (ते) तेरी (सेनायाम्) सेना में (चक्रुः) उन [शत्रुओं] ने किया है, और (याम्) जिसको तेरे (इष्वायुधे) बाण आदि शस्त्रों में (चक्रुः) उन्होंने किया है। (याम्) जिस (कृत्याम्) हिंसा को तेरी (दुन्दुभौ) दुन्दुभि में (चक्रुः) उन्होंने किया है, (ताम्) उसको (पुनः) अवश्य मैं (प्रति) उलटा (हरामि) मिटाता हूँ ॥७॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :७−(सेनायाम्) योद्धृसमूहे (इष्वायुधे) बाणादिशस्त्रे (दुन्दुभौ) बृहड्ढक्कायाम्। अन्यद् गतम् ॥