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Atharvaveda / 6 / 54 / 3

सब॑न्धु॒श्चास॑बन्धुश्च॒ यो अ॒स्माँ अ॑भि॒दास॑ति। सर्वं॒ तं र॑न्धयासि मे॒ यज॑मानाय सुन्व॒ते ॥3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 6 | Sukta : 54 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अग्नीषोमौ | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : राज्य की रक्षा के लिये उपदेश।

पदपाठ : सऽब॑न्धु: । च॒ । अस॑बन्धु: । च॒ । य: । अ॒स्मान् । अ॒भि॒ऽदास॑ति । सर्व॑म् । तम् । र॒न्ध॒या॒सि॒ । मे॒ । यज॑मानाय । सु॒न्वते॒ ॥५४.३॥

पदार्थ : (यः) जो शत्रु (सबन्धुः) बन्धुओं सहित (च च) और (असबन्धुः) बिना बन्धुओं के होकर (अस्मान्) हमें (अभिदासति) सतावे। (तम्) उस (सर्वम्) सब को (सुन्वते) तत्त्वमथन करनेवाले (यजमानाय) विद्वानों का सत्कार करनेवाले (मे) मेरे लिये (रन्धयासि) वश में कर ॥३॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :३−पूर्वार्द्धो व्याख्यातः−अ० ६।१५।२। उत्तरार्द्धः−अ० ६।६।१।