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Atharvaveda / 6 / 70 / 2

यथा॑ ह॒स्ती ह॑स्ति॒न्याः प॒देन॑ प॒दमु॑द्यु॒जे। यथा॑ पुं॒सो वृ॑षण्य॒त स्त्रि॒यां नि॑ह॒न्यते॒ मनः॑। ए॒वा ते॑ अघ्न्ये॒ मनोऽधि॑ व॒त्से नि ह॑न्यताम् ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 6 | Sukta : 70 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : काङ्कायन | देवता : अघ्न्या | छन्द : जगती | स्वर :

विषय : परमेश्वर की भक्ति का उपदेश।

पदपाठ : यथा॑ । ह॒स्ती । ह॒स्ति॒न्या: । प॒देन॑ । प॒दम् । उ॒त्ऽयु॒जे । यथा॑ । पुं॒स: । वृ॒ष॒ण्य॒त: । स्त्रि॒याम् । नि॒ऽह॒न्यते॑ । मन॑: । ए॒व । ते॒ । अ॒घ्न्ये॒ । मन॑: । अधि॑ । व॒त्से । नि । ह॒न्य॒ता॒म् ॥७०.२॥

पदार्थ : (यथा) जैसे (हस्ती) हाथी (हस्तिन्याः) हथिनी के (पदेन) पदचिह्न से (पदम्) अपना पद (उद्युजे) बढ़ाये जाता है। (यथा) जैसे (वृषण्यतः) अपने को ऐश्वर्यवान् माननेवाले (पुंसः) पुरुष का (मनः) मन (स्त्रियाम्) स्तुति क्रिया [वा अपनी पत्नी] में (निहन्यते) स्थिर रहता है। (एव) वैसे ही (अघ्न्ये) हे न मारने योग्य प्रजा ! (ते) तेरा (मनः) मनः (वत्से) सब में निवास करनेवाले परमेश्वर में (अधि) अच्छे प्रकार (नि हन्यताम्) दृढ़ होवे ॥२॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२−(यथा) (हस्ती) हस्ताज्जातौ। पा० ५।२।१३३। इति−णिनि। गजः (हस्तिन्याः) करेण्वाः (पदम्) पादम् (उद्युजे) युजिर् योगे, छान्दसो विकरणस्य लुक्। उद्युङ्क्ते। उन्नमयति। अन्यत्पूर्ववत् ॥