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Atharvaveda / 6 / 132 / 4

यमि॑न्द्रा॒ग्नी स्म॒रमसि॑ञ्चताम॒प्स्व१॒॑न्तः शोशु॑चानं स॒हाध्या। तं ते॑ तपामि॒ वरु॑णस्य॒ धर्म॑णा ॥ 4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 6 | Sukta : 132 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : स्मरः | छन्द : त्रिपदा विराण्महाबृहती | स्वर :

विषय : ऐश्वर्य प्राप्ति का उपदेश।

पदपाठ : यम् । इ॒न्द्रा॒ग्नी इति॑ । स्म॒रम् । असि॑ञ्चताम् । अ॒पऽसु । अ॒न्त: । शोशु॑चानम् । स॒ह । आ॒ध्या । तम् । ते॒ । त॒पा॒मि॒ । वरु॑णस्य । धर्म॑णा ॥१३२.४॥

पदार्थ : (इन्द्राग्नी) बिजुली और भौतिक अग्नि ने (अप्सु अन्तः) प्रजाओं के बीच (आध्या सह) ध्यान शक्ति के साथ (शोशुचानम्) अत्यन्त प्रकाशमान (यम् स्मरम्) जिस स्मरण सामर्थ्य को (असिञ्चताम्) सींचा है, (तम्) उस [स्मरण सामर्थ्य] को (ते) तेरे लिये (वरुणस्य) सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर के (धर्मणा) धर्म अर्थात् धारण सामर्थ्य से (तपामि) ऐश्वर्ययुक्त करता हूँ ॥४॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४−(इन्द्राग्नी) विद्युत्पावकौ (असिञ्चताम्) अवर्धयताम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥