Atharvaveda / 7 / 26 / 7
तद्विष्णोः॑ पर॒मं प॒दं सदा॑ पश्यन्ति सू॒रयः॑। दि॒वी᳡व॒ चक्षु॒रात॑तम् ॥ 7॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 7 | Sukta : 26 | Paryay : | Mantra No : 7
In English:
Seer : medhaatithiH | Devta : viShNuH | Metre : gaayatrii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : tadviShNoH parama.m pada.m sadaa pashyanti suurayaH. divii᳡va chakShuraatatam . 7.
Component Words : tat . viShNoH . paramam . padam . sadaa . pashyanti . suurayaH . divi.aiva . chakShuH . aa.atatam .27.7.
In Hindi:
ऋषि : मेधातिथिः | देवता : विष्णुः | छन्द : गायत्री | स्वर :
विषय : व्यापक ईश्वर के गुणों का उपदेश।
पदपाठ : तत् । विष्णो॑: । प॒र॒मम् । प॒दम् । सदा॑ । प॒श्य॒न्ति॒ । सू॒रय॑: । दि॒विऽइ॑व । चक्षु॑: । आऽत॑तम् ॥२७.७॥
पदार्थ : (सूरयः) बुद्धिमान् पण्डित लोग (विष्णोः) सर्वव्यापक विष्णु के (तत्) उस (परमम्) अति उत्तम (पदम्) पाने योग्य स्वरूप को (सदा) सदा (पश्यन्ति) देखते हैं (इव) जैसे (दिवि) प्रकाश में (आततम्) फैला हुआ (चक्षुः) नेत्र [दृश्य पदार्थों को देखता है] ॥७॥"
भावार्थ : टिप्पणी :७−(तत्) प्रसिद्धम् (विष्णोः) व्यापकस्य (परमम्) सर्वोत्कृष्टम् (पदम्) प्राप्तव्यं स्वरूपं मोक्षम् (सदा) सर्वदा (पश्यन्ति) संप्रेक्षन्ते। साक्षात्कुर्वन्ति (सूरयः) अ० २।११।४। मेधाविनः पण्डिताः (दिवि) सूर्यादिप्रकाशे (इव) यथा (चक्षुः) नेत्रम्। पश्यति दृश्यानि इति शेषः (आततम्) प्र सृतम् ॥