Atharvaveda / 7 / 89 / 3
इ॒दमा॑पः॒ प्र व॑हताव॒द्यं च॒ मलं॑ च॒ यत्। यच्चा॑भिदु॒द्रोहानृ॑तं॒ यच्च॑ शे॒पे अ॒भीरु॑णम् ॥ 3॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 7 | Sukta : 89 | Paryay : | Mantra No : 3
In English:
Seer : sindhudviipaH | Devta : agniH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : idamaapaH pra vahataavadya.m cha mala.m cha yat. yachchaabhidudrohaanRRita.m yachcha shepe abhiiruNam . 3.
Component Words : idam . aapaH . pra . vahata . avadyam . cha . malam . cha . yat . yat . cha . abhi.adudroha . anRRitam . yat . cha . shepe . abhiiruNam .94.3.
In Hindi:
ऋषि : सिन्धुद्वीपः | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : विद्वानों की संगति का उपदेश।
पदपाठ : इ॒दम् । आ॒प॒: । प्र । व॒ह॒त॒ । अ॒व॒द्यम् । च॒ । मल॑म् । च॒ । यत् । यत् । च॒ । अ॒भि॒ऽदु॒द्रोह॑ । अनृ॑तम् । यत् । च॒ । शे॒पे । अ॒भीरु॑णम् ॥९४.३॥
पदार्थ : (आपः) हे जल [के समान शुद्धि करनेवाले विद्वानो !] (इदम्) इस [सब] को (प्रवहत) बहा दो, (यत्) जो कुछ [मुझ में] (अवद्यम्) अकथनीय [निन्दनीय] (च च) और (मलम्) मलिन कर्म है। (च) और (यत्) जो कुछ (अनृतम्) झूँठ-मूँठ (अभिदुद्रोह) बुरा चीता है, (च) और (यत्) जो कुछ (अभीरुणम्) निर्भय [निरपराधी] पुरुष को (शेपे) मैंने दुर्वचन कहा है ॥३॥"
भावार्थ : टिप्पणी :३−(इदम्) वक्ष्यमाणम् (आपः) जलानीव शुद्धिकरा विद्वांसः (प्रवहत) अपनयत (अवद्यम्) अकथनीयं निन्द्यम् (च च) समुच्चये (मलम्) अ० २।७।१। मलिनं कर्म (यत्) यत् किञ्चित् (अभिदुद्रोह) द्रुह जिघांसायाम्-लिट्। अनिष्टं चिन्तितवानस्मि (अमृतम्) यथा तथा। असत्यम् (शेपे) शप आक्रोशे-लिट्। दुर्वचनं कथितवानस्मि (अभीरुणम्) क्षधिपिशिमिथिभ्यः कित्। उ० ३।५५। ञिभी भये-उनन्, स च कित्, रुडागमः। निर्भयम्। अनपराधिनम् ॥