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Atharvaveda / 8 / 4 / 8

यो मा॒ पाके॑न॒ मन॑सा॒ चर॑न्तमभि॒चष्टे॒ अनृ॑तेभि॒र्वचो॑भिः। आप॑ इव काशिना॒ संगृभीता॒ अस॑न्न॒स्त्वास॑त इन्द्र व॒क्ता ॥ 8॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 8 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : चातनः | देवता : इन्द्रासोमौ, अर्यमा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : राजा और मन्त्री के धर्म का उपदेश।

पदपाठ : य: । मा॒ । पाके॑न । मन॑सा । चर॑न्तम् । अ॒भि॒ऽचष्टे॑ । अनृ॑तेभि: । वच॑:ऽभि: । आप॑:ऽइव । का॒शिना॑ । सम्ऽगृ॑भीता: । अस॑न् । अ॒स्तु॒ । अस॑त: । इ॒न्द्र॒ । व॒क्ता ॥४.८॥

पदार्थ : (यः) जो [दुराचारी] (पाकेन) परिपक्व [दृढ़] (मनसा) मन से (चरन्तम्) विचरते हुए (मा) मुझ को (अनृतेभिः) असत्य (वचोभिः) वचनों से (अभिचष्टे) झिड़कता है। (इन्द्र) हे परम ऐश्वर्यवाले राजन् ! (काशिना) मुट्ठी में (संगृभीताः) लिये हुए (आपः इव) जल के समान, [वह] (असतः) असत्य का (वक्ता) बोलनेवाला (असन्) अविद्यमान (अस्तु) हो जावे ॥८॥"

भावार्थ :