Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 8 / 10 / 5 / 7

तां वसु॑रुचिः सौर्यवर्च॒सो᳡धो॒क्तां पुण्य॑मे॒व ग॒न्धम॑धोक्। 7॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 5 | Sukta : 10 | Paryay : 5 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : अथर्वाचार्यः | देवता : विराट् | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर :

विषय : ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पदपाठ : ताम् । वसु॑ऽरुचि: । सौ॒र्य॒ऽव॒र्च॒स: । अ॒धो॒क् । ताम् । पुण्य॑म् । ए॒व । ग॒न्धम् । अ॒धो॒क् ॥१४.७॥

पदार्थ : (ताम्) उस [विराट्] को (सौर्यवर्चसः) सूर्य का प्रकाश जाननेवाले (वसुरुचिः) वसु [सबके निवास परमेश्वर] में रुचिवाले [जीव] ने (अधोक्) दुहा है, (ताम् एव) उससे ही (पुण्यम्) पवित्र (गन्धम्) ज्ञान को (अधोक्) दुहा है ॥७॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :७−(ताम्) विराजम् (वसुरुचिः) वसौ सर्वनिवासे जगदीश्वरे रुचिः प्रीतिर्यस्य स जीवः (गन्धम्) गन्ध गतिहिंसायाचनेषु-अच्। बोधम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥