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Atharvaveda / 8 / 10 / 6 / 3

यत्प्र॑त्या॒हन्ति॑ वि॒षमे॒व तत्प्र॒त्याह॑न्ति ॥ 3॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 6 | Sukta : 10 | Paryay : 6 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अथर्वाचार्यः | देवता : विराट् | छन्द : द्विपदा प्राजापत्यानुष्टुप् | स्वर :

विषय : ब्रह्मविद्या का उपदेश।

पदपाठ : यत् । प्र॒ति॒ऽआ॒हन्ति॑ । वि॒षम् । ए॒व । तत् । प्र॒ति॒ऽआह॑न्ति ॥१५.३॥

पदार्थ : [तब] (यत्) नियन्ता [ब्रह्म] (विषम्) विष को (एव) इस प्रकार (प्रत्याहन्ति) हटा देता है, (तत्) विस्तार करनेवाला [ब्रह्म] (प्रत्याहन्ति) हटा देता है ॥३॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२, ३−(न) सम्प्रति-निरु० ७।३१। (च) (मनसा) मननेन (त्वा) त्वां विषम् (प्रत्याहन्मि) प्रतिकूलं नाशयामि (इति) (यत्) यमयतीति। यत्। यम-क्विप्। गमादीनामिति वक्तव्यम्। वा० पा० ६।४।४०। मलोपः। नियन्तृ ब्रह्म (विषम्) दोषम् (एव) एवम् (तत्) म० १। विस्तारकं ब्रह्म अन्यत् पूर्ववत् ॥