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Atharvaveda / 9 / 1 / 16

यथा॒ मधु॑ मधु॒कृतः॑ सं॒भर॑न्ति॒ मधा॒वधि॑। ए॒वा मे॑ अश्विना॒ वर्च॑ आ॒त्मनि॑ ध्रियताम् ॥ 16॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 9 | Sukta : 1 | Paryay : | Mantra No : 16

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : मधु, अश्विनौ | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : ब्रह्म की प्राप्ति का उपदेश।

पदपाठ : यथा॑ । मधु॑ । म॒धु॒ऽकृत॑: । स॒म्ऽभर॑न्ति । मधौ॑ । अधि॑ । ए॒व । मे॒ । अ॒श्वि॒ना॒ । वर्च॑: । आ॒त्मनि॑ । ध्रि॒य॒ता॒म् ॥१.१६॥

पदार्थ : (यथा) जैसे (मधुकृतः) ज्ञान करनेवाले [आचार्य लोग] (मधु) [एक] ज्ञान को (मधौ) [दूसरे] ज्ञान पर (अधि) यथावत् (संभरन्ति) भरते जाते हैं, (एव) वैसे ही, (अश्विना) हे [कार्यकुशल] माता-पिता ! (मे आत्मनि) मेरे आत्मा में [विद्या का] (वर्चः) प्रकाश (ध्रियताम्) धरा जावे ॥१६॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१६−(मधु) ज्ञानम् (मधुकृतः) बोधकर्तारः। आचार्याः (संभरन्ति) संगृह्य धरन्ति (मधौ) ज्ञाने (अधि) यथावत्। अन्यत् पूर्ववत्-म० ११ ॥