Atharvaveda / 9 / 5 / 33
यो वै सं॒यन्तं॒ नाम॒र्तुं वेद॑। सं॑य॒तींसं॑यतीमे॒वाप्रि॑यस्य॒ भ्रातृ॑व्यस्य॒ श्रिय॒मा द॑त्ते। ए॒ष वै सं॒यन्नाम॒र्तुर्यद॒जः पञ्चौ॑दनः। निरे॒वाप्रि॑यस्य॒ भ्रातृ॑व्यस्य॒ श्रियं॑ दहति॒ भव॑त्या॒त्मना॒ यो॒जं पञ्चौ॑दनं॒ दक्षि॑णाज्योतिषं॒ ददा॑ति ॥ 33॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 9 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 33
In English:
Seer : bhRRiguH | Devta : ajaH pa~nchaudanaH | Metre : dashapadaa prakRRitiH | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yo vai sa.myanta.m naamartu.m veda. sa.myatii.msa.myatiimevaapriyasya bhraatRRivyasya shriyamaa datte. eSha vai sa.myannaamarturyadajaH pa~nchaudanaH. nirevaapriyasya bhraatRRivyasya shriya.m dahati bhavatyaatmanaa yoja.m pa~nchaudana.m dakShiNaajyotiSha.m dadaati . 33.
Component Words : yaH . vai . sam.ayantam . naama . RRitum . veda . sa.myatiim.asa.myatiim . eva . apriyasya . bhraatRRivyasya . shriyam . aa . datte . eShaH . vai . sam.ayan . naama . RRituH . yat . ajaH . pa~ncha.aodanaH .5.33.
In Hindi:
ऋषि : भृगुः | देवता : अजः पञ्चौदनः | छन्द : दशपदा प्रकृतिः | स्वर :
विषय : ब्रह्मज्ञान से सुख का उपदेश।
पदपाठ : य: । वै । स॒म्ऽयन्त॑म् । नाम॑ । ऋ॒तुम् । वेद॑ । सं॒य॒तीम्ऽसं॑यतीम् । ए॒व । अप्रि॑यस्य । भ्रातृ॑व्यस्य । श्रिय॑म् । आ । द॒त्ते॒ । ए॒ष: । वै । स॒म्ऽयन् । नाम॑ । ऋ॒तु: । यत् । अ॒ज: । पञ्च॑ऽओदन: ॥५.३३॥
पदार्थ : (यः) जो [परमेश्वर] (वै) निश्चय करके (संयन्तम्) [अन्न आदि] मिलानेवाले (नाम) प्रसिद्ध (ऋतुम्) ऋतु को (वेद) जानता है और [जो] (अप्रियस्य) अप्रिय (भ्रातृव्यस्य) शत्रु की (संयतीं संयतीम्) अत्यन्त एकत्र करनेवाली (श्रियम्) लक्ष्मी को (एव) निश्चय करके (आ दत्ते) ले लेता है। (एषः वै) वही परमेश्वर (संयन्) एकत्र करनेवाला (नाम) प्रसिद्ध (ऋतुः) ऋतु [के समान] (यत्) पूजनीय ब्रह्म (अजः) अजन्मा (पञ्चौदनः) पाँच भूतों [पृथिवी आदि] का सींचनेवाला [परमेश्वर] है। वह [मनुष्य अपने] (एव) निश्चय करके (अप्रियस्य) अप्रिय (भ्रातृव्यस्य) शत्रु की (श्रियम्) श्री को (निर्दहति) जला देता है, और (आत्मना) अपने आत्मबल के साथ (भवति) रहता है। (यः) जो [पुरुष] (पञ्चौदनम्) पाँच भूतों [पृथिवी आदि] के सींचनेवाले, (दक्षिणाज्योतिषम्) दानक्रिया की ज्योति रखनेवाले (अजम्) अजन्मे वा गतिशील परमात्मा को [अपने आत्मा में] (ददाति) समर्पित करता है ॥३३॥"
भावार्थ : टिप्पणी :३३−(संयन्तम्) इण् गतौ-शतृ, अन्तर्गतण्यर्थः। अन्नादि संगमयन्तम् (संयतीं संयतीम्) संगमयन्तीं संगमयन्तीम् (संयन्) संगमयन्। अन्यत् पूर्ववत् ॥