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Atharvaveda / 9 / 6 / 3 / 5

की॒र्तिं च॒ वा ए॒ष यश॑श्च गृ॒हाणा॑मश्नाति॒ यः पूर्वोऽति॑थेर॒श्नाति॑ ॥ 5॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 3 | Sukta : 6 | Paryay : 9 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : त्रिपदा पिपीलिकमध्या गायत्री | स्वर :

विषय : अतिथि के सत्कार का उपदेश।

पदपाठ : की॒र्तिम् । च॒ । वै । ए॒ष: । यश॑: । च॒ । गृ॒हाणा॑म् । अ॒श्ना॒ति॒ । य: । पूर्व॑: । अति॑थे: । अ॒श्नाति॑ ॥८.५॥

पदार्थ : (एषः) वह [गृहस्थ] (वै) निश्चय करके (कीर्तिम्) कीर्ति (च च) और (यशः) यश [अर्थात् प्रताप] को (गृहाणाम्) घरों के बीच (अश्नाति) भक्षण [अर्थात् नाश] करता है, (यः) जो (अतिथेः पूर्वः) अतिथि से पहिले (अश्नाति) खाता है ॥५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :५−(कीर्तिम्) प्रसिद्धिम् (यशः) प्रतापम् ॥