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Atharvaveda / 9 / 6 / 4 / 4

याव॑दतिरा॒त्रेणे॒ष्ट्वा सुस॑मृद्धेनावरु॒न्द्धे ताव॑देने॒नाव॑ रुन्द्धे ॥ 4॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 4 | Sukta : 6 | Paryay : 10 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : त्रिपदा गायत्री | स्वर :

विषय : अतिथि के सत्कार का उपदेश।

पदपाठ : याव॑त् । अ॒ति॒ऽरा॒त्रेण॑ । इ॒ष्ट्वा । उ॒प॒ऽहर॑ति ॥९.४॥

पदार्थ : (यावत्) जितना [फल] (सुसमृद्धेन) बड़ी सम्पत्तिवाले (अतिरात्रेण) अतिरात्र से (इष्ट्वा) यज्ञ करके (अवरुन्धे) [मनुष्य] पाता है, (तावत्) उतना [फल] (एनेन) इस [कर्म] से (अवरुन्धे) वह [विद्वान्] पाता है ॥४॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :३, ४−(सर्पिः) अ० १।१५।४। घृतम् (अतिरात्रेण) अहःसर्वैकदेशसंख्यातपुण्याच्च रात्रेः। पा० ५।४।८७। अच् प्रत्ययः। रात्रिमतीत्य वर्तते स अतिरात्रः। तेन सोमयागविशेषेण। अन्यत् पूर्ववत् ॥