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Atharvaveda / 9 / 6 / 4 / 6

याव॑त्सत्त्र॒सद्ये॑ने॒ष्ट्वा सुस॑मृद्धेनावरु॒न्द्धे ताव॑देने॒नाव॑ रुन्द्धे ॥ 6॥

Veda : Atharvaveda | Paryay : 4 | Sukta : 6 | Paryay : 10 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : त्रिपदा गायत्री | स्वर :

विषय : अतिथि के सत्कार का उपदेश।

पदपाठ : याव॑त् ।‍ स॒त्त्र॒ऽसद्ये॑न । इ॒ष्ट्वा । उ॒प॒ऽहर॑ति ॥९.६॥

पदार्थ : (यावत्) जितना [फल] (सुसमृद्धेन) बड़ी सम्पत्तिवाले (सत्त्रसद्येन) सत्र सद्य से [सोमयाग विशेष से] (इष्ट्वा) यज्ञ करके (अवरुन्धे) [मनुष्य] पाता है, (तावत्) उतना [फल] (एनेन) इस [कर्म] से (अवरुन्धे) वह [विद्वान्] पाता है ॥६॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :५, ६−(मधु) क्षौद्रम् (सत्त्रसद्येन) गुधृवीपचि०। उ० ४।१६७। षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु−त्र प्रत्ययः, यद्वा सत्र विस्तारे-घञ्+षद्लृ−क्विप्। तदर्हति। पा० ५०।१।६३। इति यत्। सत्रसदां सभ्यानां योग्येन सोमयागविशेषेण। अन्यत् पूर्ववत् ॥