Atharvaveda / 9 / 6 / 6 / 11
स उप॑हूतो लो॒केषु॑ भक्षय॒त्युप॑हूत॒स्तस्मि॒न्यल्लो॒केषु॑ विश्वरू॑पम् ॥ 11॥
Veda : Atharvaveda | Paryay : 6 | Sukta : 6 | Paryay : 12 | Mantra No : 11
In English:
Seer : brahmaa | Devta : atithiH, vidyaa | Metre : aarchii bRRihatii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : sa upahuuto lokeShu bhakShayatyupahuutastasminyallokeShu vishvaruupam . 11.
Component Words : saH . upa.ahuutaH . lokeShu . bhakShayati . upa.ahuutaH . tasmin . yat . lokeShu . vishva.aruupam .11.1.
In Hindi:
ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अतिथिः, विद्या | छन्द : आर्ची बृहती | स्वर :
विषय : अतिथि के सत्कार का उपदेश।
पदपाठ : स: । उप॑ऽहूत: । लो॒केषु॑ । भ॒क्ष॒य॒ति॒ । उप॑ऽहूत: । तस्मि॑न् । यत् । लो॒केषु॑ । वि॒श्वऽरू॑पम् ॥११.१॥
पदार्थ : (सः) वह [अतिथि जब] (उपहूतः) बुलाया गया (लोकेषु) [दीखते हुए] लोकों में [वर्तमान परस्पर सम्बन्ध को] (भक्षयति) भोगता है, (तस्मिन्) उसको [भोग करने के] उपरान्त (उपहूतः) बुलाया गया वह [गृहस्थ] (लोकेषु) लोकों में (यत्) जो कुछ (विश्वरूपम्) विविध रूप [वस्तु है, उसे भोगता है] ॥११॥"
भावार्थ : टिप्पणी :११−(लोकेषु) दृश्यमानेषु भुवनेषु सूर्यचन्द्रपृथिवीमङ्गलबुधबृहस्पत्यादिलोकेषु वर्तमानं परस्परसम्बन्धम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥