Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 9 / 7 / 11

चेतो॒ हृद॑यं॒ यकृ॑न्मे॒धा व्र॒तं पु॑री॒तत् ॥ 11॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 9 | Sukta : 7 | Paryay : | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : गौः | छन्द : साम्न्युष्णिक् | स्वर :

विषय : सृष्टि की धारणविद्या का उपदेश।

पदपाठ : चेत॑: । हृद॑यम् । यकृ॑त् । मे॒धा । व्र॒तम् । पु॒रि॒ऽतत् ॥१२.११॥

पदार्थ : [सृष्टि में] (चेतः) विचार (हृदयम्) हृदय (मेधा) बुद्धि (यकृत्) [सङ्गति करनेवाला] कलेजा (व्रतम्) व्रत [नियम] (पुरीतत्) पुरीतत् [शरीर को फैलानेवाली सूक्ष्म आँत के समान हैं] ॥११॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :११−(चेतः) ज्ञानम् (हृदयम्) हृदयं चेतनास्थानमोजसश्चाश्रयम्। शार्ङ्गधरः, अ० ५।४२। (यकृत्) शकेर्ऋतिन्। उ० ४।५८। यज सङ्गतिकरणे−ऋतिन्, जस्य कः। संगच्छमानम्। कालखण्डम्। यकृद्रञ्जकपित्तस्य स्थानं रक्तस्य संश्रयम्। शार्ङ्गधरः, अ० ५।३९। (मेधा) बुद्धिः (व्रतम्) वरणीयो व्यवहारः। नियमः (पुरीतत्) कॄगॄशॄपॄकुटि०। उ० ४।१४३। पॄ पालनपूरणयोः−इ+तनु विस्तारे−क्विप्। पुरीं शरीरं तनोतीति। सूक्ष्मान्त्रम् ॥