Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 10 / 5 / 46

अ॒पो दि॒व्या अ॑चायिषं॒ रसे॑न॒ सम॑पृक्ष्महि। पय॑स्वानग्न॒ आग॑मं॒ तं मा॒ सं सृ॑ज॒ वर्च॑सा ॥ 46॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 46

In Hindi:

ऋषि : सिन्धुद्वीपः | देवता : प्रजापतिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : शत्रुओं के नाश का उपदेश।

पदपाठ : अ॒प: । दि॒व्या: । अ॒चा॒यि॒ष॒म् । रसे॑न । सम् । अ॒पृ॒क्ष्म॒हि॒ । पय॑स्वान् । अ॒ग्ने॒ । आ । अ॒ग॒म॒म् । तम् । मा॒ । सम् । सृ॒ज॒ । वर्च॑सा ॥५.४६॥

पदार्थ : (दिव्याः) दिव्य गुण स्वभाववाले (अपः) जलों [के समान शुद्ध करनेवाले विद्वानों] को (अचायिषम्) मैंने पूजा है (रसेन) पराक्रम से (सम् अपृक्ष्महि) हम संयुक्त हुए हैं। (अग्ने) हे विद्वान् ! (पयस्वान्) गतिवाला मैं (आ अगमम्) आया हूँ (तम्) उस (मा) मुझको (वर्चसा) [वेदाध्ययन आदि के] तेज से (सम् सृज) संयुक्त कर ॥४६॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४६−अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० ७।८९।१ ॥