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Atharvaveda / 10 / 6 / 13

यमब॑ध्ना॒द्बृह॒स्पति॒र्वाता॑य म॒णिमा॒शवे॑। तं बिभ्र॑त्सवि॒ता म॒णिं तेने॒दम॑जय॒त्स्वः᳡। सो अ॑स्मै सू॒नृतां॑ दुहे॒ भूयो॑भूयः॒ श्वःश्व॒स्तेन॒ त्वं द्वि॑ष॒तो ज॑हि ॥ 13॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 6 | Paryay : | Mantra No : 13

In Hindi:

ऋषि : बृहस्पतिः | देवता : फालमणिः, वनस्पतिः | छन्द : त्र्यवसाना षट्पदा त्रिष्टुब्गर्भा जगती | स्वर :

विषय : सब कामनाओं की सिद्धि का उपदेश।

पदपाठ : यम् । अब॑ध्नात् । बृह॒स्पति॑: । वाता॑य । म॒णिम् । आ॒शवे॑ । तम् । बिभ्र॑त् । स॒वि॒ता । म॒णिम् । तेन॑ । इ॒दम् । अ॒ज॒य॒त् । स्व᳡: । स: । अ॒स्मै॒ । सू॒नृता॑य । दु॒हे॒ । भूय॑:ऽभूय:। श्व:ऽश्व॑: । तेन॑ । त्वम् । द्वि॒ष॒त: । ज॒हि॒ ॥६.१३॥

पदार्थ : (यम्) जिस (मणिम्) मणि [प्रशंसनीय वैदिकनियम] को (बृहस्पतिः) बृहस्पति [बड़े ब्रह्माण्डों के स्वामी परमेश्वर] ने (वाताय) गमनशील (आशवे) भोक्ता [प्राणी] के लिये (अबध्नात्) बाँधा है। (तम्) उस (मणिम्) मणि [प्रशंसनीय वैदिक नियम] को (बिभ्रत्) धारण करके (सविता) सब के चलानेवाले [मनुष्य] ने (तेन) उस [वैदिक नियम] द्वारा (इदम् स्वः) यह सुख (अजयत्) जीता है। (सः) वह [वैदिक नियम] (अस्मै) इस [प्राणी] के लिये (सूनृताम्) प्रिय सत्य वाणी को (भूयोभूयः) बहुत-बहुत (श्वः श्वः) कल्प के पीछे कल्प [नित्य आगामी काल में] (दुहे) पूरा करता है, (तेन) उस [वैदिक नियम] से (त्वम्) तू (द्विषतः) वैरियों को (जहि) मार ॥१३॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१३−(बिभ्रत्) धारयन् (सविता) सर्वप्रेरकः पुरुषः (स्वः) सुखम्। स्वर्गम् (अस्मै) प्राणिने (सूनृताम्) अ० ३।१२।२। प्रियसत्यात्मिकां वाणीम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥