Atharvaveda / 10 / 9 / 24
यत्ते॒ चर्म॑ शतौदने॒ यानि॒ लोमा॑न्यघ्न्ये। आ॒मिक्षां॑ दुह्रतां दा॒त्रे क्षी॒रं स॒र्पिरथो॒ मधु॑ ॥ 24॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 10 | Sukta : 9 | Paryay : | Mantra No : 24
In English:
Seer : atharvaa | Devta : shataudanaa (gauH) | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : yatte charma shataudane yaani lomaanyaghnye. aamikShaa.m duhrataa.m daatre kShiira.m sarpiratho madhu . 24.
Component Words : yat . te . charma . shata.aodane . yaani . lomaani . aghnye . aamikShaam . duhrataam . daatre . kShiiram . sarpiH . atho iti . madhu .9.24.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : शतौदना (गौः) | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : वेदवाणी की महिमा का उपदेश।
पदपाठ : यत् । ते॒ । चर्म॑ । श॒त॒ऽओ॒द॒ने॒ । यानि॑ । लोमा॑नि । अ॒घ्न्ये॒ । आ॒मिक्षा॑म् । दु॒ह्र॒ता॒म् । दा॒त्रे । क्षी॒रम् । स॒र्पि: । अथो॒ इति॑ । मधु॑ ॥९.२४॥
पदार्थ : (शतौदने) हे सैकड़ों प्रकार सींचनेवाली ! और (अघ्न्ये) हे न मारनेवाली ! [वेदवाणी] (यत्) जो (ते) तेरा (चर्म) चर्म और (यानि) जो (लोमानि) लोम हैं, वे सब (आमिक्षाम्) आमिक्षा [पकाये उष्ण दूध में दही मिलाने से उत्पन्न वस्तु], (क्षीरम्) दूध, (सर्पिः) घी (अथो) और भी (मधु) मधुज्ञान [ब्रह्मविद्या] (दात्रे) दाता को (दुह्रताम्) भरपूर करें ॥२४॥"
भावार्थ : टिप्पणी :२४−(शतौदने) म० १। हे बहुप्रकारसेचनशीले (अघ्न्ये) म० ३। हे अहिंसिके वेदवाणि। अन्यद् गतम्−म० १३ स्पष्टं च ॥