Atharvaveda / 11 / 10 / 10
बृह॒स्पति॑राङ्गिर॒स ऋष॑यो॒ ब्रह्म॑संशिताः। अ॑सुर॒क्षय॑णं व॒धं त्रिष॑न्धिं दि॒व्याश्र॑यन् ॥ 10॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 11 | Sukta : 10 | Paryay : | Mantra No : 10
In English:
Seer : bhRRigva~NgiraaH | Devta : triShandhiH | Metre : puroviraaDjagatii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : bRRihaspatiraa~Ngirasa RRiShayo brahmasa.mshitaaH. asurakShayaNa.m vadha.m triShandhi.m divyaashrayan . 10.
Component Words : bRRihaspatiH . aa~NgirasaH . RRiShayaH . brahma.asa.mshitaaH . asura.akShayaNam . vadham . tri.asa.mdhim . divi . aa . ashrayan .12.10.
In Hindi:
ऋषि : भृग्वङ्गिराः | देवता : त्रिषन्धिः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदपाठ : बृह॒स्पति॑: । आ॒ङ्गि॒र॒स: । ऋष॑य: । ब्रह्म॑ऽसंशिता: । अ॒सु॒र॒ऽक्षय॑णम् । व॒धम् । त्रिऽसं॑धिम् । दि॒वि । आ । अ॒श्र॒य॒न् ॥१२.१०॥
पदार्थ : (आङ्गिरसः) विद्वानों के शिष्य (बृहस्पतिः) बृहस्पति [बड़े-बड़ों के रक्षक राजा] ने और (ब्रह्मसंशिताः) वेदज्ञान से तीक्ष्ण किये गये (ऋषयः) ऋषियों [धर्मदर्शकों] ने (दिवि) विजय की इच्छा में (असुरक्षयणम्) असुरनाशक (वधम्) शस्त्ररूप (त्रिषन्धिम्) त्रिसन्धि [म० २। त्रयीकुशल सेनापति] का (आ अश्रयन्) आश्रय लिया है ॥१०॥"
भावार्थ : टिप्पणी :१०−(बृहस्पतिः) बृहतां रक्षको राजा (आङ्गिरसः) तस्येदम्। पा० ४।३।१२०। अङ्गिरस्-अण्। अङ्गिरसां विज्ञानिनां शिष्यः (ऋषयः) अ० २।६।१। सन्मार्गदर्शकाः (ब्रह्मसंशिताः) अ० ३।१९।८। शो तनूकरणे-क्त। ब्रह्मणा वेदज्ञानेन सुतीक्ष्णीकृताः (असुरक्षयणम्) दुष्टानां क्षयकरम् (वधम्) शस्त्ररूपम् (त्रिषन्धिम्) म० २। त्रयीकुशलं सेनापतिम् (दिवि) विजिगीषायाम् (आश्रयन्) श्रिञ् सेवायाम्-लङ्। आश्रितवन्तः ॥