Atharvaveda / 12 / 2 / 2
अ॑घशंसदुःशं॒साभ्यां॑ क॒रेणा॑नुक॒रेण॑ च। यक्ष्मं॑ च॒ सर्वं॒ तेने॒तो मृ॒त्युं च॒ निर॑जामसि ॥ 2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 12 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : bhRRiguH | Devta : agniH | Metre : ekaavasaanaanichRRidviShamaatripaadgaayatrii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : aghasha.msaduHsha.msaabhyaa.m kareNaanukareNa cha. yakShma.m cha sarva.m teneto mRRityu.m cha nirajaamasi . 2.
Component Words : aghasha.msa.aduHsha.msaabhyaam . kareNa . anu.akareNa . cha . yakShmam . cha . sarvam . tena . itaH . mRRityum . cha . niH . ajaamasi .2.2.
In Hindi:
ऋषि : भृगुः | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदपाठ : अ॒घ॒शं॒स॒ऽदु॒:शं॒साभ्या॑म् । क॒रेण॑ । अ॒नु॒ऽक॒रेण॑ । च॒ । यक्ष्म॑म् । च॒ । सर्व॑म् । तेन॑ । इ॒त: । मृ॒त्युम् । च॒ । नि: । अ॒जा॒म॒सि॒ ॥२.२॥
पदार्थ : (अघशंसदुःशंसाभ्याम्) दोनों बुरा चीतनेवाले और खोटी करनीवाले पुरुषों के नाश के लिये (तेन) उस (करेण) कर [लेने] से (च) और (अनुकरेण) अनुकूल कर्म से (इतः) यहाँ से (सर्वम्) सब (यक्ष्मम्) राजरोग (च च) और (मृत्युम्) मृत्यु को (निः अजामसि) हम बाहिर निकालते हैं ॥२॥"
भावार्थ : टिप्पणी :२−(अघशंसदुःशंसाभ्याम्) अघ पापकरणे−पचाद्यच्+शसि इच्छायाम्−अच्, दुर्+शंसु दुर्गतौ−पचाद्यच्। क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः। पा० २।३।५। अघशंसदुःशंसौ अनिष्टचिन्तकदुष्कर्मिणौ नाशयितुम् (करेण) राजग्राह्यधनेन (अनुकरेण) अनुकूलकर्मणा (च) (यक्ष्मम्) राजरोगम् (च) (सर्वम्) (तेन) (इतः) अस्मात् स्थानात् (मृत्युम्) मरणम् (च) (निरजामसि) बहिष्कुर्मः ॥