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Atharvaveda / 12 / 5 / 12

सैषा भी॒मा ब्र॑ह्मग॒व्य१॒॑घवि॑षा सा॒क्षात्कृ॒त्या कूल्ब॑ज॒मावृ॑ता ॥ 12॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 12 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : अथर्वाचार्यः | देवता : ब्रह्मगवी | छन्द : विराड्विषमा गायत्री | स्वर :

विषय : वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।

पदपाठ : सा । ए॒षा । भी॒मा । ब्र॒ह्म॒ऽग॒वी । अ॒घऽवि॑षा । स॒ऽअ॒क्षात् । कृ॒त्या । कूल्ब॑जम् । आऽवृ॑ता ॥७.१॥

पदार्थ : (सा एषा) वह यही (ब्रह्मगवी) वेदवाणी [वेदनिन्दक को] (भीमा) डरावनी (अघविषा) महाघोर विषैली, (साक्षात्) साक्षात् [प्रत्यक्ष] (कृत्या) हिंसारूप और (कूल्बजम्) भूमि पर दाह उपजानेवाली वस्तुरूप [हो जाती है, जब वह] (आवृता) रोक दी गयी हो ॥१२॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१२−(सा−एषा) पूर्वोक्तैव (भीमा) भयंकरा (ब्रह्मगवी) म० ५। वेदवाणी (अघविषा) अघ पापकरणे−अच्+विष विप्रयोगे−क, टाप्। अतिशयेन विषमयी यथा (साक्षात्) प्रत्यक्षम् (कृत्या) अ० ४।९।५। कृञ् हिंसायाम्−क्यप्+तुक्, टाप्। हिंसाक्रिया (कूल्बजम्) कु+उल्व+जम्। उल्वादयश्च। उ० ४।९५। कु+उल दाहे−वन्+अन्येष्वपि दृश्यते। पा० ३।२।१०१। जन जनने−ड। कौ भूमौ दाहजनकं वस्तु तथा (आवृता) आच्छादिता। निरुद्धा ॥