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Atharvaveda / 12 / 5 / 39

तस्या॑ आ॒हन॑नं कृ॒त्या मे॒निरा॒शस॑नं वल॒ग ऊब॑ध्यम् ॥ 39॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 12 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 39

In Hindi:

ऋषि : अथर्वाचार्यः | देवता : ब्रह्मगवी | छन्द : साम्नी पङ्क्तिः | स्वर :

विषय : वेदवाणी रोकने के दोषों का उपदेश।

पदपाठ : तस्या॑: । आ॒ऽहन॑नम् । कृ॒त्या । मे॒नि: । आ॒ऽशस॑नम्। व॒ल॒ग: । ऊब॑ध्यम् ॥९.१॥

पदार्थ : (तस्याः) उस [वेदवाणी] का (आहननम्) ताड़ना [वेदनिन्दक के लिये] (कृत्या) हिंसा क्रिया, (आशसनम्) [उसको] पीड़ा देना (मेनिः) [उसके लिये] वज्र, और [ऊबध्यम्] [उसका] दुष्ट बन्धक (वलगः) [उसके लिये] दुःख है ॥३९॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :३९−(तस्याः) ब्रह्मगव्याः (आहननम्) समन्तात्ताडनम् (कृत्या) म० १२। हिंसाक्रिया (मेनिः) वज्रः (आशसनम्) शसु हिंसायाम्−ल्युट्। सर्वथा हिंसनम् (वलगः) अ० ५।३१।४। मुदिग्रोर्गग्गौ। उ० १।१२८। बल वधे−ग प्रत्ययः, अकारागमः। वधः (ऊबध्यम्) अ० ९।४।१६। दुर्+बध संयमने=बन्धने−यत्, दुर् इत्यस्य स्थाने ऊत्त्वम्। दुर्बन्धनम् ॥