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Atharvaveda / 13 / 4 / 6

तं व॒त्सा उप॑ तिष्ठ॒न्त्येक॒शीर्षा॑णो यु॒ता दश॑ ॥ 6॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 13 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : ब्रह्मा | देवता : अध्यात्मम् | छन्द : प्राजापत्यानुष्टुप् | स्वर :

विषय : परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदपाठ : तम् । व॒त्सा: । उप॑ । ति॒ष्ठ॒न्ति॒ । एक॑ऽशीर्षाण: । यु॒ता: । दश॑ ॥४.६॥

पदार्थ : (तम्) उस [परमात्मा] को (एकशीर्षाणः) एक [परमात्मा] को शिर [प्रधान] माननेवाले (दश) दस [चार दिशाओं, चार मध्य दिशाओं और ऊपर-नीचे की दिशाओं से सम्बन्धवाले] (युताः) मिले हुए (वत्साः) निवास स्थान [सब लोक] (उप तिष्ठन्ति) सेवते हैं ॥६॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :६−(तम्) परमात्मानम् (वत्साः) वस निवासे-स प्रत्ययः। निवासस्थानाः सर्वलोकाः (उपतिष्ठन्ति) सेवन्ते (एकशीर्षाणः) एकः परमेश्वरः शिरः प्रधानो येषां ते (युताः) संयुक्ताः (दश) ऊर्ध्वाधोभ्यां सह पूर्वादिचतसृभिः, ईशानादिचतसृभिर्दिग्भिः सम्बद्धाः ॥