Atharvaveda / 14 / 2 / 55
बृह॒स्पति॒नाव॑सृष्टां॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑धारयन्। भगो॒ गोषु॒ प्रवि॑ष्टो॒यस्तेने॒मां सं सृ॑जामसि ॥55॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 14 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 55
In English:
Seer : savitrii, suuryaa | Devta : aatmaa | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : bRRihaspatinaavasRRiShTaa.m vishve devaa adhaarayan. bhago goShu praviShToyastenemaa.m sa.m sRRijaamasi .55.
Component Words : bRRihaspatinaa . ava.asRRiShTaam . vishve . devaaH . adhaarayan . bhagaH . goShu . pra.aviShTaH . yaH . tena . imaam . sam . sRRijaamasi .2.55.
In Hindi:
ऋषि : सवित्री, सूर्या | देवता : आत्मा | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : गृहआश्रम का उपदेश।
पदपाठ : बृह॒स्पति॑ना । अव॑ऽसृष्टाम् । विश्वे॑ । दे॒वा: । अ॒धा॒र॒य॒न् । भग॑: । गोषु॑ । प्रऽवि॑ष्ट: । य: । तेन॑ । इ॒माम् । सम् । सृ॒जा॒म॒सि॒ ॥२.५५॥
पदार्थ : (बृहस्पतिना)बृहस्पति [बड़ी वेदवाणी के रक्षक आचार्य] करके (अवसृष्टाम्) दी हुई [दीक्षा, नियम व्रतकी शिक्षा] को (विश्वे देवाः) सब विद्वानों ने (अधारयन्) धारण कियाहै। (यः) जो (भगः) सेवनीय प्रभाव [ऐश्वर्य] (गोषु) विद्वानों में (प्रविष्टः) प्रविष्ट है, (तेन) उससे (इमाम्) इस [प्रजा, स्त्री सन्तान आदि] को (सं सृजामसि) हम संयुक्त करते हैं ॥५५॥"
भावार्थ : टिप्पणी :५५−(भगः) सेवनीयः प्रभावः। ऐश्वर्यम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥