Atharvaveda / 14 / 2 / 57
बृह॒स्पति॒नाव॑सृष्टां॒ विश्वे॑ दे॒वा अ॑धारयन्। पयो॒ गोषु॒ प्रवि॑ष्टं॒यत्तेने॒मां सं सृ॑जामसि ॥57॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 14 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 57
In English:
Seer : savitrii, suuryaa | Devta : aatmaa | Metre : atijaagatagarbhaa bhuriktriShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : bRRihaspatinaavasRRiShTaa.m vishve devaa adhaarayan. payo goShu praviShTa.myattenemaa.m sa.m sRRijaamasi .57.
Component Words : bRRihaspatinaa . ava.asRRiShTaam . vishve . devaaH . adhaarayan . payaH . goShu . pra.aviShTam . yat . tena . imaam . sam . sRRijaamasi .2.57.
In Hindi:
ऋषि : सवित्री, सूर्या | देवता : आत्मा | छन्द : अनुष्टुप् | स्वर :
विषय : गृहआश्रम का उपदेश।
पदपाठ : बृह॒स्पति॑ना । अव॑ऽसृष्टाम् । विश्वे॑ । दे॒वा: । अ॒धा॒र॒य॒न् । पय॑: । गोषु॑ । प्रऽवि॑ष्टम् । यत् । तेन॑ । इ॒माम् । सम् । सृ॒जा॒म॒सि॒ ॥२.५७॥
पदार्थ : (बृहस्पतिना)बृहस्पति [बड़ी वेदवाणी के रक्षक आचार्य] करके (अवसृष्टाम्) दी हुई [दीक्षा, नियम व्रतकी शिक्षा] को (विश्वे देवाः) सब विद्वानों ने (अधारयन्) धारण कियाहै। (यत्) जो (पयः) विज्ञान (गोषु) विद्वानों में (प्रविष्टम्)प्रविष्ट है, (तेन) उससे (इमाम्) इस [प्रजा, स्त्री सन्तान आदि] को (सं सृजामसि) हम संयुक्त करते हैं ॥५७॥"
भावार्थ : टिप्पणी :५७−(पयः) पय गतौ-असुन्। विज्ञानम्। अन्यद् गतम् ॥