Atharvaveda / 15 / 2 / 2
तं बृ॒हच्च॑रथन्त॒रं चा॑दि॒त्याश्च॒ विश्वे॑ च दे॒वा अ॑नु॒व्य᳡चलन् ॥2॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 2
In English:
Seer : atharvaa | Devta : adhyaatma athavaa vraaty | Metre : jagatii | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : ta.m bRRihachcharathantara.m chaadityaashcha vishve cha devaa anuvya᳡chalan .2.
Component Words : tam . bRRihat . cha . ratham.ataram . cha . aadityaaH . cha . vishve . cha . devaaH . anu.avya᳡chalan .2.2.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : साम्नी त्रिष्टुप् | स्वर :
विषय : परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।
पदपाठ : तम् । बृ॒हत् । च॒ । र॒थ॒म्ऽत॒रम् । च॒ । आ॒दि॒त्या: । च॒ । विश्वे॑ । च॒ । दे॒वा: । अ॒नु॒ऽव्य᳡चलन् ॥२.२॥
पदार्थ : (बृहत्) बृहत् [बड़ाआकाश] (च च) और (रथन्तरम्) रथन्तर [रमणीय गुणों द्वारा पार होने योग्य जगत्] (च)और (आदित्याः) सब चमकनेवाले सूर्य आदि (च) और (विश्वे) सब (देवाः) गतिवाले लोक (तम्) उस [व्रात्य परमात्मा] के (अनुव्यचलन्) पीछे-पीछे विचरे ॥२॥"
भावार्थ : टिप्पणी :२−(तम्) व्रात्यं परमात्मानम् (बृहत्) प्रवृद्धमाकाशम् (च) (रथन्तरम्) अ० ८।१०(२)।६। रमु क्रीडायाम्-क्थन्+तॄ प्लवनतरणयोः-खच् मुम् च।रमणीयैर्गुणैस्तरणीयं जगत् (च) (आदित्याः) आदीप्यमानाः सूर्यादिलोकाः (च) (विश्वे)सर्वे (च) (देवाः) दिवु गतौ-पचाद्यच्। गतिमन्तो लोकाः (अनुव्यचलन्) अनुसृत्यव्यचरन् ॥