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Atharvaveda / 15 / 4 / 5

ग्रैष्मौ॒ मासौ॑गो॒प्तारा॒वकु॑र्वन्यज्ञाय॒ज्ञियं॑ च वामदे॒व्यं चा॑नुष्ठा॒तारौ॑ ॥5॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : प्राजापत्या पङ्क्ति | स्वर :

विषय : परमेश्वर के रक्षा गुण का उपदेश।

पदपाठ : ग्रैष्मौ॑ । मासौ॑ । गो॒प्तारौ॑ । अकु॑र्वन् । य॒ज्ञा॒य॒ज्ञिय॑म् । च॒ । वा॒म॒ऽदे॒व्यम् । च॒ । अ॒नु॒ऽस्था॒तारौ॑ ।४.५॥

पदार्थ : (ग्रैष्मौ) घामवाले [ज्येष्ठ-आषाढ़] (मासौ) दो महीनों को (गोप्तारौ) दो रक्षक (अकुर्वन्) उन [विद्वानों] ने बनाया, (यज्ञायज्ञियम्) सब यज्ञों के हितकारी [वेदज्ञान] को (चच) और (वामदेव्यम्) वामदेव [श्रेष्ठ परमात्मा] से जताये गये [भूतपञ्चक] को (अनुष्ठातारौ) दो अनुष्ठाता [साथ रहनेवाले वा कार्यसाधक] [बनाया] ॥५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :५, ६−(ग्रैष्मौ)ग्रीष्म-अण्। निदाघसम्बन्धिनौ ज्येष्ठाषाढौ (मासौ) (यज्ञायज्ञियम्)व्याख्यातम्-सू० ३ म० ५ (वामदेव्यम्) गतम्-सू० ३ म० ५। अन्यत् पूर्ववत् ॥