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Atharvaveda / 15 / 5 / 3

नास्य॑ प॒शून्न स॑मा॒नान्हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥3॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : रुद्र | छन्द : द्विपदा प्राजापत्या अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : परमात्माके अन्तर्यामी होने का उपदेश।

पदपाठ : न । अ॒स्य॒ । प॒शून् । न । स॒मा॒नम् । हि॒न॒स्ति॒ । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥५.३॥

पदार्थ : (हिनस्ति) कष्ट देताहै, (न) न (अस्य) उस [विद्वान्] के (पशून्) प्राणियों को और (न) न (समानान्) [उसके] तुल्य गुणवालों को [कष्ट देता है], (यः) जो [विद्वान्] (एवम्) ऐसे वाव्यापक [व्रात्य परमात्मा] को (वेद) जानता है ॥३॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :३−(न) निषेधे (अस्य) विदुषः (पशून्)प्राणिनः (न) (समानान्) तुल्यगुणान् पुरुषान् (हिनस्ति) दुःखयति (यः) विद्वान् (एवम्) ईदृशं व्यापकं वा व्रात्यं परमात्मानम् (वेद) जानाति ॥