Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 15 / 5 / 5

श॒र्वए॑नमिश्वा॒सो दक्षि॑णाया दि॒शो अ॑न्तर्दे॒शाद॑नुष्ठा॒तानु॑ तिष्ठति॒ नैनं॑श॒र्वो न भ॒वो नेशा॑नः। नास्य॑ प॒शून्न स॑मा॒नान्हि॑नस्ति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥5॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : रुद्र | छन्द : त्रिपदा ब्राह्मी गायत्री | स्वर :

विषय : परमात्माके अन्तर्यामी होने का उपदेश।

पदपाठ : श॒र्व: । ए॒न॒म् । इ॒षु॒ऽआ॒स: । दक्षि॑णाया: । दि॒श: । अ॒न्त॒:ऽदे॒शात् । अ॒नु॒ऽस्था॒ता । अनु॑ । ति॒ष्ठ॒ति॒ । न । ए॒न॒म् । श॒र्व: । न । भ॒व: । न । ईशा॑न: । न । अ॒स्य॒ । प॒शून् । न । स॒मा॒नम् । हि॒न॒स्ति॒ । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥५.५॥

पदार्थ : (शर्वः) दुःखनाशक, (इष्वासः) हिंसा निवारक, (अनुष्ठाता) साथ रहनेवाला जगदीश्वर (दक्षिणायाः दिशः)दक्षिण दिशा के (अन्तर्देशात्) मध्य देश से (एनम् अनु) इस [विद्वान्] के साथ (तिष्ठति) रहता है, (एनम्) उस [विद्वान्] को (न) न (शर्वः) दुःखनाशक, (न) न (भवः) सर्वत्र वर्तमान और (न) न (ईशानः) सर्वस्वामी परमेश्वर (हिनस्ति) कष्ट देताहै, (न) न (अस्य) उस [विद्वान्] के (पशून्) प्राणियों को और (न) न (समानान्) [उसके] तुल्य गुणवालों को [कष्ट देता है], (यः) जो [विद्वान्] (एवम्) ऐसे वाव्यापक [व्रात्य परमात्मा] को (वेद) जानता है ॥५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४, ५−स्पष्टंपूर्ववच्च ॥