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Atharvaveda / 15 / 11 / 11

ऐनं॑ निका॒मोग॑च्छति निका॒मे नि॑का॒मस्य॑ भवति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥11॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 11 | Paryay : | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : द्विपदा आर्ची अनुष्टुप् | स्वर :

विषय : अतिथिसत्कार के विधान का उपदेश।

पदपाठ : आ । ए॒न॒म् । नि॒ऽका॒म: । ग॒च्छ॒ति॒ । नि॒ऽका॒मे । नि॒ऽका॒मस्य॑ । भ॒व॒ति॒ । य: । ए॒वम् । वेद॑ ॥११.११॥

पदार्थ : (एनम्) उस [गृहस्थ] को (निकामः) लालसा (आ) आकर (गच्छति) मिलती है, वह (निकामस्य) लालसा की (निकामे)निरन्तर पूर्ति में (भवति) होता है, (यः) जो [गृहस्थ] (एवम्) ऐसे [विद्वान्] को (वेद) जानता है ॥११॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :११−(निकामः) लालसा (निकामे) निरन्तरकामे। इच्छापूर्तौ (निकामस्य)लालसायाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥