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Atharvaveda / 15 / 12 / 11

नास्या॒स्मिंल्लो॒क आ॒यत॑नं शिष्यते॒ य ए॒वं वि॒दुषा॒ व्रात्ये॒नान॑तिसृष्टोजु॒होति॑ ॥11॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 12 | Paryay : | Mantra No : 11

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : त्रिपदा प्राजापत्या त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : यज्ञ करने में विद्वान् की सम्मति का उपदेश।

पदपाठ : न । अ॒स्य॒ । अ॒स्मिन् । लो॒के । आ॒ऽयत॑नम् । शि॒ष्य॒ते॒ । य: । ए॒वम् । वि॒दुषा॑ । व्रात्ये॑न । अन॑तिऽसृष्ट:। जु॒होति॑ ॥१२.११॥

पदार्थ : (अस्मिन् लोके) इससंसार में (अस्य) उस (गृहस्थ) की (आयतनम्) मर्यादा (न शिष्यते) शेष नहीं रहतीहै, (यः) जो (एवम्) व्यापक परमात्मा को (विदुषा) जानते हुए (व्रात्येन) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] करके (अनतिसृष्टः) नहीं आज्ञा दिया हुआ (जुहोति) यज्ञकरता है ॥११॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :११−(न) निषेधे (अनतिसृष्टः) अनाज्ञापितः। अन्यत् पूर्ववत्-म० ७ ॥