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Atharvaveda / 15 / 15 / 5

तस्य॒व्रात्य॑स्य। यो᳡ऽस्य॑ तृ॒तीयः॑ प्रा॒णो॒ऽभ्यू॑ढो॒ नामा॒सौ स च॒न्द्रमाः॑॥5॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 15 | Sukta : 15 | Paryay : | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : अध्यात्म अथवा व्रात्य | छन्द : द्विपदा साम्नी बृहती | स्वर :

विषय : अतिथि के सामर्थ्य का उपदेश।

पदपाठ : तस्य॑ । व्रात्य॑स्य । य: । अ॒स्य॒ । तृ॒तीय॑:। प्रा॒ण: । अ॒भिऽऊ॑ढ: । नाम॑ । अ॒सौ । स: । च॒न्द्रमा॑: ॥१५.५॥

पदार्थ : (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (तृतीयः) तीसरा (प्राणः) प्राण [श्वास] (अभ्यूढः) अभ्यूढ [सामने से प्राप्त] (नाम) नाम है, (सः) सो (असौ चन्द्रमाः) यह चन्द्रमा है [अर्थात् वह बताता है किउपग्रह चन्द्रमा, अपने ग्रह पृथिवी से किस सम्बन्ध से क्या प्रभाव करता है औरइसी प्रकार अन्य चन्द्रमाओं का अन्य ग्रहों से क्या सम्बन्ध है] ॥५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :५−(अभ्यूढः) आभिमुख्येन प्राप्तः (चन्द्रमाः) चन्द्रविद्याप्रचारः। अन्यत्पूर्ववत् स्पष्टं च ॥