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Atharvaveda / 16 / 1 / 2

रु॒जन्प॑रिरु॒जन्मृ॒णन्प्र॑मृ॒णन् ॥2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 16 | Sukta : 1 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : प्रजापति | छन्द : याजुषी त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : दुःख से छूटने का उपदेश।

पदपाठ : रु॒जन् । प॒रि॒ऽरु॒जन् । मृ॒णन् । प्र॒ऽमृ॒णन् ॥१.२॥

पदार्थ : (रुजन्) तोड़ता हुआ, (परिरुजन्) सब ओर से तोड़ता हुआ, (मृणन्) मारता हुआ, (प्रमृणन्) कुचलता हुआ ॥२॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२−(रुजन्) विदारयन् (परिरुजन्) सर्वतो विदारयन् (मृणन्) मारयन् (प्रमृणन्) प्रकर्षेण नाशयन् ॥