Atharvaveda / 18 / 3 / 31
दक्षि॑णायां त्वादि॒शि पु॒रा सं॒वृतः॑ स्व॒धाया॒मा द॑धामि बाहु॒च्युता॑ पृथि॒वी द्यामि॑वो॒परि॑।लो॑क॒कृतः॑ पथि॒कृतो॑ यजामहे॒ ये दे॒वानां॑ हु॒तभा॑गा इ॒ह स्थ ॥31॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 18 | Sukta : 3 | Paryay : | Mantra No : 31
In English:
Seer : atharvaa | Devta : yama, mantrokt | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : dakShiNaayaa.m tvaadishi puraa sa.mvRRitaH svadhaayaamaa dadhaami baahuchyutaa pRRithivii dyaamivopari.lokakRRitaH pathikRRito yajaamahe ye devaanaa.m hutabhaagaa iha stha .31.
Component Words : dakShiNaayaam . tvaa . dishi . puraa . sam.avRRitaH. svadhaayaam . aa . dadhaami. baahu.achyutaa . pRRithivii . dyaam.aiva . upari . loka.akRRitaH . pathi.akRRitaH . yajaamahe . ye . devaanaam . huta.abhaagaaH . iha . stha .3.31.
In Hindi:
ऋषि : अथर्वा | देवता : यम, मन्त्रोक्त | छन्द : विराट् शक्वरी | स्वर :
विषय : सर्वत्र परमेश्वर के धारण का उपदेश।
पदपाठ : दक्षि॑णायाम् । त्वा॒ । दि॒शि । पु॒रा । स॒म्ऽवृत॑:। स्व॒धाया॑म् । आ । द॒धा॒मि॒। बा॒हु॒ऽच्युता॑ । पृ॒थि॒वी । द्याम्ऽइव॑ । उ॒परि॑ । लो॒क॒ऽकृत॑: । प॒थि॒ऽकृत॑: । य॒जा॒म॒हे॒ । ये । दे॒वाना॑म् । हु॒तऽभा॑गा: । इ॒ह । स्थ ॥३.३१॥
पदार्थ : (दक्षिणायाम्) दक्षिणवा दाहिनी (दिशि) दिशा में (त्वा) तुझे (स्वधायाम्)आत्मधारण शक्ति के बीच (पुरा) पूर्ति के साथ (संवृतः) घिरा हुआ मैं (आ) सब ओर से (दधामि) मैं [मनुष्य अपने में] धारण करता हूँ, (बाहुच्युता) भुजाओं से उत्साह दीगयी (पृथिवी) पृथिवी (इव) जैसे (द्याम् उपरि) सूर्य पर [सूर्य के आकर्षण, प्रकाशआदि के सहारे पर], [अपने में तुझे धारण करती है]। (लोककृतः) समाजों के करनेवाले, (पथिकृतः) मार्गों के बनानेवाले, [तुम लोगों] को (यजामहे) हम पूजते हैं, (ये) जोतुम (देवानाम्) विद्वानों के बीच (हुतभागाः) भाग लेनेवाले (इह) यहाँ पर (स्थ) हो ॥३१॥"
भावार्थ : टिप्पणी :३१−(दक्षिणायाम्) दक्षिणहस्तस्थितायाम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥