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Atharvaveda / 18 / 3 / 35

ऊ॑र्ध्वायां त्वादि॒शि पु॒रा सं॒वृतः॑ स्व॒धाया॒मा द॑धामि बाहु॒च्युता॑ पृथि॒वी द्यामि॑वो॒परि॑। लो॑क॒कृतः॑ पथि॒कृतो॑ यजामहे॒ ये दे॒वानां॑ हु॒तभा॑गा इ॒ह स्थ ॥35॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 18 | Sukta : 3 | Paryay : | Mantra No : 35

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : यम, मन्त्रोक्त | छन्द : भुरिक् त्रिष्टुप् | स्वर :

विषय : सर्वत्र परमेश्वर के धारण का उपदेश।

पदपाठ : ऊ॒र्ध्वाया॑म् । त्वा॒ । दि॒श‍ि । पु॒रा । स॒म्ऽवृत॑: । स्व॒धाया॑म् । आ । द॒धा॒मि॒ । बा॒हु॒ऽच्युता॑ । पृ॒थि॒वी । द्याम्ऽइ॑व । उ॒परि॑ । लो॒क॒ऽकृत॑: । प॒थि॒ऽकृत॑: । य॒जा॒म॒हे॒ । ये । दे॒वाना॑म् । हु॒तऽभा॑गा: । इ॒ह । स्थ ॥३.३५॥

पदार्थ : [हे परमेश्वर !] (ऊर्ध्वायाम्) ऊपरवाली (दिशि) दिशा में (त्वा) तुझे (स्वधायाम्) आत्मधारणशक्तिके बीच (पुरा) पूर्ति के साथ (संवृतः) घिरा हुआ मैं [मनुष्य] (आ) सब ओर से (दधामि) धारण करता हूँ, (बाहुच्युता) भुजाओं से उत्साह दी गयी (पृथिवी) पृथिवी (इव) जैसे (द्याम् उपरि) सूर्य पर [सूर्य के आकर्षण, प्रकाश आदि के सहारे पर, अपने में तुझे धारण करती है] (लोककृतः) समाजों के करनेवाले, (पथिकृतः) मार्गोंके बनानेवाले, [तुम लोगों] को (यजामहे) हम पूजते हैं, (ये) जो तुम (देवानाम्)विद्वानों के बीच (हुतभागाः) भाग लेनेवाले (इह) यहाँ पर (स्थ) हो ॥३५॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :३५−(ऊर्ध्वायाम्) उपरि स्थितायाम्। अन्यत् पूर्ववत् ॥