Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 18 / 4 / 19

अ॑पू॒पवा॑न्घृ॒तवां॑श्च॒रुरेह सी॑दतु। लो॑क॒कृतः॑ पथि॒कृतो॑ यजामहे॒ येदे॒वानां॑ हु॒तभा॑गा इ॒ह स्थ ॥19॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 18 | Sukta : 4 | Paryay : | Mantra No : 19

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : यम, मन्त्रोक्त | छन्द : त्रिपदा भुरिक् महाबृहती | स्वर :

विषय : यजमान के कर्तव्य का उपदेश।

पदपाठ : अ॒पू॒पऽवा॑न् । घृ॒तऽवा॑न् । च॒रु: । आ । इ॒ह । सी॒द॒तु॒ । लो॒क॒ऽकृत॑: । प॒थि॒ऽकृत॑: । य॒जा॒म॒हे॒ । ये । दे॒वाना॑म् । हु॒तऽभा॑गा: । इ॒ह । स्थ ॥४.१९॥

पदार्थ : (अपूपवान्) अपूपों [शुद्ध पके हुए भोजनों मालपूए पूड़ी आदि]वाला, (घृतवान्) घृतवाला (चरुः)चरु [स्थालीपाक] (इह) यहाँ [वेदी पर] (आ सीदतु) आवे। (लोककृतः) समाजों केकरनेवाले, (पथिकृतः) मार्गों के बनानेवाले [तुम लोगों] को (यजामहे) हम पूजतेहैं, (ये) जो तुम (देवानाम्) विद्वानों के बीच (हुतभागाः) भाग लेनेवाले (इह)यहाँ पर (स्थ) हो ॥१९॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१९−(घृतवान्) आज्येन युक्तः। अन्यत् पूर्ववत्-म० १६ ॥