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Atharvaveda / 19 / 19 / 2

वा॒युर॒न्तरि॑क्षे॒णोद॑क्राम॒त्तां पुरं॒ प्र ण॑यामि वः। तामा वि॑शत॒ तां प्र वि॑शत॒ सा वः॒ शर्म॑ च॒ वर्म॑ च यच्छतु ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 19 | Sukta : 19 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : अथर्वा | देवता : चन्द्रमाः, मन्त्रोक्ताः | छन्द : अनुष्टुब्गर्भा पङ्क्तिः | स्वर :

विषय : रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।

पदपाठ : वा॒युः। अ॒न्तरि॑क्षेण‍। उत्। अ॒क्रा॒म॒त्। ताम्। पुर॑म्। प्र। न॒या॒मि॒। वः॒। ताम्। आ। वि॒श॒त॒। ताम्। प्र। वि॒श॒त॒। सा। वः॒। शर्म॑। च॒। वर्म॑। च॒। य॒च्छ॒तु॒ ॥१९.२॥

पदार्थ : (वायुः) वायु [पवन] (अन्तरिक्षेण) आकाश के साथ (उत् अक्रामत्) ऊपर चढ़ा है, (ताम्) उस (पुरम्) अग्रगामिनी शक्ति [वा दुर्गरूप परमेश्वर] की ओर (वः) तुम्हें (प्र) आगे (नयामि) लिये चलता हूँ। (ताम्) उस [शक्ति] में (आ विशत) तुम घुस जाओ, (ताम्) उसमें (प्र विशत) तुम भीतर जाओ, (सा) वह [शक्ति] (वः) तुम्हें (शर्म) सुख (च च) और (वर्म) कवच [रक्षा साधन] (यच्छन्तु) देवे ॥२॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२−(वायुः) वातः। पवनः (अन्तरिक्षेण) आकाशेन। अन्यद् गतम् ॥