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Atharvaveda / 20 / 2 / 2

अ॒ग्निराग्नी॑ध्रात्सु॒ष्टुभः॑ स्व॒र्कादृ॒तुना॒ सोमं॑ पिबतु ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 2 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : गृत्समदो मेधातिथिर्वा | देवता : अग्निः | छन्द : एकावसाना विराड्गायत्री | स्वर :

विषय : विद्वानों के व्यवहार का उपदेश।

पदपाठ : अ॒ग्नि: । आग्नी॑ध्रात् । सु॒ऽस्तुभ॑: । सु॒ऽअ॒र्कात् । ऋ॒तुना॑ । सोम॑म् । पि॒ब॒तु॒ ॥२.२॥

पदार्थ : (अग्निः) अग्नि [समान तेजस्वी पुरुष] (सुष्टुभः) बड़े स्तुतियोग्य, (स्वर्कात्) बड़े पूजनीय (आग्नीध्रात्) अग्नि की प्रकाशविद्या को आश्रय में रखनेवाले व्यवहार से (ऋतुना) ऋतु के साथ (सोमम्) उत्तम ओषधियों के रस को (पिबतु) पीवे ॥२॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२−(अग्निः) अग्निवत्तेजस्वी पुरुषः (आग्नीध्रात्) अग्नि+इन्धी दीप्तौ-क्विप्, नलोपः। अग्नीधः शरणे रञ् भ च। वा० पा० ४।३।१२०। अग्नीध्-रञ्, भत्वान्न जश्। अग्नीत् अग्निदीपनं यस्य शरण आश्रये तस्मात्। अग्निप्रकाशविद्याशरणयुक्तव्यवहारात्। शिष्टं पूर्ववत् ॥