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Atharvaveda / 20 / 5 / 5

अ॒यं त॑ इन्द्र॒ सोमो॒ निपू॑तो॒ अधि॑ ब॒र्हिषि॑। एही॑म॒स्य द्रवा॒ पिब॑ ॥ 5॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 5 | Paryay : | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : इरिम्बिठिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : सोम रस के सेवन का उपदेश।

पदपाठ : अ॒यम् । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । सोम॑: । निऽपू॑त: । अधि॑ । ब॒र्हिषि॑ । आ । इ॒हि॒ । ई॒म् । अ॒स्य । द्रव॑ । पिब॑ ॥५.५॥

पदार्थ : (इन्द्रः) हे इन्द्र ! [परम ऐश्वर्यवाले राजन् !] (ते) तेरे लिये (अयम्) यह (निपूतः) छाना हुआ (सोमः) सोम [महौषधियों का रस] (बर्हिषि अधि) बढ़िया आसन के ऊपर [है]। (आ इहि) तू आ, (ईम्) अब (द्रव) दौड़ और (अस्य) इसका (पिब) पान कर ॥॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :यह मन्त्र सामवेद में है-पू० २।७। और मन्त्र -७ सामवेद में है-उ० १।२। तृच  ॥ −(अयम्) (ते) तुभ्यम् (इन्द्रः) (सोमः) सदौषधिरसः (निपूतः) नितरां शोधितः (अधि) उपरि (बर्हिषि) प्रवृद्धासने (एहि) आगच्छ (ईम्) इदानीम् (अस्य) सोमस्य (द्रव) त्वरया आगच्छ (पिब) पानं कुरु ॥