Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 20 / 20 / 1

शु॒ष्मिन्त॑मं न ऊ॒तये॑ द्यु॒म्निनं॑ पाहि॒ जागृ॑विम्। इन्द्र॒ सोमं॑ शतक्रतो ॥ 1॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 20 | Paryay : | Mantra No : 1

In Hindi:

ऋषि : विश्वामित्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।

पदपाठ : शु॒ष्मिन्ऽत॑मम् । न॒: । ऊ॒तये॑ । द्यु॒म्निन॑म् । पा॒हि॒ । जागृ॑विम् ॥ इन्द्र॑ । सोम॑म् । श॒त॒क्र॒तो॒ इति॑ शतऽक्रतो ॥२०.१॥

पदार्थ : (शतक्रतो) हे सैकड़ों कर्मों वा बुद्धियोंवाले (इन्द्र) इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (नः) हमारी (ऊतये) रक्षा के लिये (शुष्मिन्तमम्) अत्यन्त बलवान्, (द्युम्निनम्) अत्यन्त धनी वा यशस्वी और (जागृविम्) जागनेवाले [चौकस] पुरुष की और (सोमम्) ऐश्वर्य की (पाहि) रक्षा कर ॥१॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :मन्त्र १-४ ऋग्वेद में हैं-३।३७।८-११ और पूरा सूक्त आगे है-अथर्व० २०।७।४-१० ॥ १−(शुष्मिन्तमम्) नाद्घस्य। पा० ८।२।१७। इति नुडागमः। अतिशयेन बलवन्तम् (नः) अस्माकम् (ऊतये) रक्षायै (द्युम्निनम्) धनिनम्। यशस्विनम् (पाहि) (जागृविम्) जॄश्रॄस्तॄजागृभ्यः क्विन्। उ० ४।४। जागृ निद्राक्षये-क्विन्। जागरूकम्। सावधानम् (इन्द्रः) (सोमम्) ऐश्वर्यम् (शतक्रतो) हे बहुकर्मन्। बहुप्रज्ञ ॥