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Atharvaveda / 20 / 22 / 2

मा त्वा॑ मू॒रा अ॑वि॒ष्यवो॒ मोप॒हस्वा॑न॒ आ द॑भन्। माकीं॑ ब्रह्म॒द्विषो॑ वनः ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 22 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : त्रिशोकः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।

पदपाठ : मा । त्वा॒ । मू॒रा: । अ॒वि॒ष्यव॑: । मा । उ॒प॒ऽहस्वा॑न: । आ । द॒भ॒न् ॥ माकी॑म् । ब्र॒ह्म॒ऽद्विष॑: । व॒न॒: ॥२२.२॥

पदार्थ : (त्वा) तुझको (मा) न तो (मूराः) मूढ़ (अविष्यवः) हिंसा चाहनेवाले और (मा) न (उपहस्वानः) ठट्ठा करनेवाले लोग (आ दभन्) कभी दबावें। तू (ब्रह्मद्विषः) वेद के वैरियों को (माकीम्) मत (वनः) सेवन कर ॥२॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२−(मा) निषेधे (त्वा) त्वाम् (मूराः) मूढाः-निरु–० ६।८ (अविष्यवः) अ० ११।२।२। अव हिंसायाम्-इसि, क्यच्, उप्रत्ययः। परहिंसेच्छवः (मा) निषेधे (उपहस्वानः) उप+हसतेः-वनिप्। उपहासकर्तारः (आ) समन्तात् (दभन्) दम्भु दम्भे-लुङ्। हिंसन्तु (माकीम्) निषेधे। मा शब्दार्थे (ब्रह्मद्विषः) वेदद्वेष्टॄन् (वनः) वन संभक्तौ-लङ्। भजेथाः ॥