Atharvaveda / 20 / 24 / 7
इ॒ममि॑न्द्र॒ गवा॑शिरं॒ यवा॑शिरं च नः पिब। आ॒गत्या॒ वृष॑भिः सु॒तम् ॥ 7॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 24 | Paryay : | Mantra No : 7
In English:
Seer : vishvaamitraH | Devta : indraH | Metre : anuShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : imamindra gavaashira.m yavaashira.m cha naH piba. aagatyaa vRRiShabhiH sutam . 7.
Component Words : imam . indra . go.aaashiram . yava.aaashiram . cha . naH . piba . aa.agatya . vRRiSha.abhiH . sutam .24.7.
In Hindi:
ऋषि : विश्वामित्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :
विषय : विद्वानों के गुणों का उपदेश।
पदपाठ : इ॒मम् । इ॒न्द्र॒ । गोऽआ॑शिरम् । यव॑ऽआशिरम् । च॒ । न॒: । पि॒ब॒ ॥ आ॒ऽगत्य॑ । वृष॑ऽभि: । सु॒तम् ॥२४.७॥
पदार्थ : (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष] (नः) हमारे (इमम्) इस (वृषभिः) बलवानों करके (सुतम्) सिद्ध किये गये (गवाशिरम्) पृथिवी पर फैले हुए (च) और (यवाशिरम्) अन्न के भोजनवाले पदार्थ को (आगत्य) आकर (पिब) पी ॥७॥"
भावार्थ : टिप्पणी :७−(इमम्) (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् (गवाशिरम्) म० १। पृथिव्यां व्याप्तम् (यवाशिरम्) अशेर्नित्। उ० १।२। यव+आङ्+अश भोजने-किरन्। अन्नभोजनयुक्तं पदार्थम् (च) (नः) अस्माकम् (पिब) (आगत्य) अस्मान् प्राप्य (वृषभिः) बलवद्भिः (सुतम्) साधितम् ॥