Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 20 / 27 / 4

न ते॑ व॒र्तास्ति॒ राध॑स॒ इन्द्र॑ दे॒वो न मर्त्यः॑। यद्दित्स॑सि स्तु॒तो म॒घम् ॥ 4॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 27 | Paryay : | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : राजा के लक्षणों का उपदेश।

पदपाठ : न । ते॒ । व॒र्ता । अ॒स्ति॒ । राध॑स: । इन्द्र॑ । दे॒व: । न । मर्त्य॑: ॥ यत् । दित्स॑सि । स्तु॒त: । म॒घम् ॥२७.४॥

पदार्थ : (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (ते) तेरे (राधसः) ऐश्वर्य का (वर्ता) रोकनेवाला, (न) न तो (देवः) विद्वान् पुरुष और (न) न (मर्त्यः) सामान्य पुरुष (अस्ति) है, (यत्) जब कि (स्तुतः) स्तुति किया गया तू (मघम्) धन (दित्ससि) देना चाहता है ॥४॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :४−(न) निषेधे (ते) तव (वर्ता) निवारकः (अस्ति) (राधसः) ऐश्वर्यस्य (इन्द्र) (देवः) विद्वान् पुरुषः (न) निषेधे (मर्त्यः) सामान्यो मनुष्यः (यत्) यदा (दित्ससि) दातुमिच्छसि (स्तुतः) (मघम्) मंहनीयं धनम् ॥