Atharvaveda / 20 / 29 / 5
अ॑सु॒न्वामि॑न्द्र सं॒सदं॒ विषू॑चीं॒ व्य᳡नाशयः। सो॑म॒पा उत्त॑रो॒ भव॑न् ॥5॥
Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 29 | Paryay : | Mantra No : 5
In English:
Seer : goShuuktyashvasuuktinau | Devta : indraH | Metre : triShTup | Tone :
Subject : English Translation will be uploaded as and when ready.
Verse : asunvaamindra sa.msada.m viShuuchii.m vya᳡naashayaH. somapaa uttaro bhavan .5.
Component Words : asunvaam . indra . sam.asadam . viShuuchiim . vi . anaashayaH . soma.apaaH . ut.ataraH . bhavan .29.5.
In Hindi:
ऋषि : गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :
विषय : राजा के धर्म का उपदेश।
पदपाठ : अ॒सु॒न्वाम् । इ॒न्द्र॒ । स॒म्ऽसद॑म् । विषू॑चीम् । वि । अ॒ना॒श॒य॒: ॥ सो॒म॒ऽपा: । उत्ऽत॑र: । भव॑न् ॥२९.५॥
पदार्थ : (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले सेनापति] (सोमपाः) ऐश्वर्य का रक्षक और (उत्तरः) बड़ा विजयी (भवन्) होकर तूने (असुन्वाम्) भेंट न देती हुई (विषूचीम्) इतर-बितर चलती हुई (संसदम्) भीड़ का (वि अनाशयः) विनाश कर दिया है ॥॥"
भावार्थ : टिप्पणी :−(असुन्वाम्) षुञ् अभिषवे-शानच्, स्वादिभ्यः श्नुः, ततष्टाप्, अमि कृते नकारलोपः। असुन्वानाम्। अभिषवं बलिं राजग्राह्यं भागं न ददतीम् (इन्द्रः) (संसदम्) जनसंहतिम् (विषूचीम्) नानागतिम् (वि) विशेषेण (अनाशयः) नाशितवानसि (सोमपाः) ऐश्वर्यरक्षकः (उत्तरः) उत्+तॄ अभिभवे-अप्। उत्कर्षेण विजयी (भवन्) सन् ॥