Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Atharvaveda / 20 / 40 / 2

अ॑नव॒द्यैर॒भिद्यु॑भिर्म॒खः सह॑स्वदर्चति। ग॒णैरिन्द्र॑स्य॒ काम्यैः॑ ॥ 2॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 40 | Paryay : | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : मधुच्छन्दाः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।

पदपाठ : अ॒न॒व॒द्यै: । अ॒भिद्यु॑ऽभि: । म॒ख: । सह॑स्वत् । अ॒र्च॒ति॒ ॥ ग॒णै: । इन्द्र॑स्य । काम्यै॑: ॥४०.२॥

पदार्थ : (अनवद्यैः) निर्दोष, (अभिद्युभिः) सब ओर से प्रकाशमान और (काम्यैः) प्रीति के योग्य (गणैः) गणों [प्रजागणों] के साथ (इन्द्रस्य) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले राजा] का (मखः) यज्ञ [राज्य व्यवहार] (सहस्वत्) अतिदृढ़ता से (अर्चति) सत्कार पाता है ॥२॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :२−(अनवद्यैः) निर्दोषैः (अभिद्युभिः) अभितः प्रकाशमानैः (मखः) मख गतौ-घप्रत्ययः। यज्ञः-निघ०३।१७। राज्यव्यवहारः (सहस्वत्) यथा स्यात्तथा। बलवत्त्वेन। अतिदृढत्वेन (अर्चति) अर्च्यते। सत्क्रियते (गणैः) प्रजाजनैः (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवतो राज्ञः (काम्यैः) कमेर्णिङ्। पा०३।१।३०। कमु कान्तौ-णिङ्। अचो यत्। पा०३।१।९७। कामि-यत्। कामयितव्यैः। प्रीतियोग्यैः ॥