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Atharvaveda / 20 / 47 / 10

यु॒ञ्जन्ति॑ ब्र॒ध्नम॑रु॒षं चर॑न्तं॒ परि॑ त॒स्थुषः॑। रोच॑न्ते रोच॒ना दि॒वि ॥ 10॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 47 | Paryay : | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : मधुच्छन्दाः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : १०-१२-परमेश्वर के गुणों का उपदेश।

पदपाठ : यु॒ञ्जन्ति॑ । ब॒ध्नम् । अ॒रु॒षम् । चर॑न्तम् । परि॑ । त॒स्थुष॑: ॥ रोच॑न्ते । रो॒च॒ना । दि॒वि ॥४७.१०॥

पदार्थ : (तस्थुषः) मनुष्य आदि प्राणियों और लोकों में (परि) सब ओर से (चरन्तम्) व्यापे हुए, (ब्रध्नम्) महान् (अरुषम्) हिंसारहित [परमात्मा] को (रोचना) प्रकाशमान पदार्थ (दिवि) व्यवहार के बीच (युञ्जन्ति) ध्यान में रखते और (रोचन्ते) प्रकाशित होते हैं ॥१०॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :मन्त्र १०-१२ आचुके हैं-अ० २०।२६।४-६ और आगे हैं-२०।६९।९-११ ॥ १०-१२−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० २०।२६।४-६ ॥