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Atharvaveda / 20 / 47 / 14

अप॒ त्ये ता॒यवो॑ यथा॒ नक्ष॑त्रा यन्त्य॒क्तुभिः॑। सूरा॑य वि॒श्वच॑क्षसे ॥ 14॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 47 | Paryay : | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः | देवता : सूर्यः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : १३-२१। परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदपाठ : अप॑ । त्ये । ता॒यव॑: । य॒था॒ । नक्ष॑त्रा । य॒न्ति॒ । अ॒क्तुऽभि॑: ॥ सूरा॑य । वि॒श्वऽच॑क्षसे ॥४७.१४॥

पदार्थ : (विश्वचक्षसे) सबके दिखानेवाले (सूराय) सूर्य के लिये (अक्तुभिः) रात्रियों के साथ (नक्षत्रा) तारा गण (अप यन्ति) भाग जाते हैं, (यथा) जैसे (त्ये) वे (तायवः) चोर [भाग जाते हैं] ॥१४॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१३-२१−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० १३।२।१६-२४ ॥