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Atharvaveda / 20 / 47 / 17

प्र॒त्यङ्दे॒वानां॒ विशः॑ प्र॒त्यङ्ङुदे॑षि॒ मानु॑षीः। प्र॒त्यङ्विश्वं॒ स्व᳡र्दृ॒शे ॥ 17॥

Veda : Atharvaveda | Kand : 20 | Sukta : 47 | Paryay : | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः | देवता : सूर्यः | छन्द : गायत्री | स्वर :

विषय : १३-२१। परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदपाठ : प्र॒त्यङ् । दे॒वाना॑म् । विश॑: । प्र॒त्यङ् । उत् । ए॒षि॒ । मानु॑षी: ॥ प्र॒त्यङ् । विश्व॑म् । स्व॑: । दृ॒शे ॥४७.१७॥

पदार्थ : [हे सूर्य !] (देवानाम्) गतिशील [चन्द्र आदि लोकों] की (विशः) प्रजाओं को (प्रत्यङ्) सन्मुख होकर, (मानुषीः) मानुषी [मनुष्यसम्बन्धी पार्थिव प्रजाओं] को (प्रत्यङ्) सन्मुख होकर और (विश्वम्) सब जगत् को (प्रत्यङ्) सन्मुख होकर (स्वः) सुख से (दृशे) देखने के लिये (उत्) ऊँचा होकर (एहि) तू प्राप्त होता है ॥१७॥"

भावार्थ :

टिप्पणी :१३-२१−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० १३।२।१६-२४ ॥